Wednesday, 26 December 2012

शारीरिक संबंध से इन्कार बना तलाक का आधार


नई दिल्ली, वैवाहिक जीवन में सामान्य शारीरिक संबंध कायम करने से मना करना बिल्कुल गलत है। शादीशुदा जीवन में पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध बहुत मायने रखते हैं और दोनों में से किसी के भी द्वारा इससे इन्कार करना दूसरे पर प्रताड़ना है। इसी टिप्पणी के साथ दिल्ली हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर ने उस महिला की तलाक की याचिका स्वीकार कर ली, जिसके पति ने यह कहते हुए यौन संबंध बनाने से इन्कार कर दिया था कि पहले वह अपनी शैक्षणिक योग्यता व नौकरी को साबित करे।
दरअसल शादी से पहले दिए गए अपने बायोडाटा में याचिकाकर्ता महिला ने खुद के नौकरी में होने की बात कही थी। जबकि वह नौकरी नहीं करती थी। इसके बाद पति ने उसके साथ यौन संबंध बनाना छोड़ दिया। इसी को आधार बनाकर महिला ने निचली अदालत से तलाक ले लिया था।
मामला हाईकोर्ट में आने पर न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर ने निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया और कहा कि शारीरिक संबंध बनाने से पहले शैक्षणिक योग्यता का प्रमाण पत्र पेश करने की शर्त रखना निश्चित रूप से नृशंसता और क्रूरता है और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत यह तलाक के आधारों में से एक है। हाईकोर्ट में महिला के पति ने अपना पक्ष रखते हुए कहा था कि उसने शादी के लिए अखबार में विज्ञापन दिया था। जिसके जवाब में महिला ने खुद के नौकरी में होने का दावा किया था।
सुहागरात को दोनों के बीच शारीरिक संबंध स्थापित हुए थे, लेकिन इसके बाद पति ने शारीरिक संबंध बनाने से इन्कार कर दिया। पति का कहना था कि शादी से पूर्व उसकी पत्नी नौकरी नहीं करती थी। कई बार उसने शिक्षा के सर्टिफिकेट दिखाने के लिए कहा, लेकिन उसने सर्टिफिकेट नहीं दिखाया। पति का कहना था कि शहर में सहज जीवन-यापन करने के लिए उसे कामकाजी महिला की जरूरत थी।
न्यायमूर्ति कैलाश गंभीर ने अपने आदेश में कहा है कि पति ने इस पवित्र रिश्ते को वस्तु विनियम प्रणाली बना दिया। पति ने पत्नी की नौकरी को ज्यादा तवज्जो दी। कोर्ट ने पति की उस दलील को ठुकरा दिया कि वह 
सर्टिफिकेट दिखाने के लिए सिर्फ इसलिए कहता था, ताकि उसके लिए उपयुक्त नौकरी खोज सके। आर्थिक रूप से मजबूत होने पर ही वह बच्चा चाहता था, इसलिए उसने आगे से संबंध बनाने से इन्कार कर दिया।

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